सिग्नल से पहले समाधान: KL University के शोध से सैटेलाइट कम्युनिकेशन को नई दिशा

Michel February 3, 2026

आज के डिजिटल दौर में सैटेलाइट कम्युनिकेशन हमारी रोजमर्रा की जिंदगी की रीढ़ बन चुका है। मोबाइल नेटवर्क, नेविगेशन सिस्टम, मौसम की जानकारी, आपदा प्रबंधन और दूर-दराज़ इलाकों तक इंटरनेट पहुंचाने में सैटेलाइट्स की भूमिका लगातार बढ़ रही है। लेकिन जैसे-जैसे दुनिया तेज़ और अधिक डेटा-आधारित होती जा रही है, वैसे-वैसे सैटेलाइट कम्युनिकेशन के सामने नई और जटिल चुनौतियां भी खड़ी हो रही हैं, Best Universities in India

भविष्य की सैटेलाइट नेटवर्क और 6G कम्युनिकेशन को ताकत देने के लिए टेराहर्ट्ज़ फ्रीक्वेंसी को बेहद अहम माना जा रहा है। इन बेहद ऊंची फ्रीक्वेंसी पर डेटा की मात्रा असाधारण रूप से ज्यादा होती है। यानी एक पल में भारी मात्रा में जानकारी भेजी जा सकती है। लेकिन इस रफ्तार की अपनी कीमत है। अंतरिक्ष से पृथ्वी तक आते समय ये सिग्नल ऐसे वातावरण से गुजरते हैं जो भले ही दिखता नहीं, लेकिन उसका असर गहरा होता है – पृथ्वी का वायुमंडल।

वायुमंडल में मौजूद गैसों और अणुओं की परतें टेराहर्ट्ज़ सिग्नलों को मोड़ सकती हैं, उनकी गति को धीमा कर सकती हैं और उनकी ताकत को कम कर सकती हैं। इतनी तेज़ स्पीड पर मामूली सा बदलाव भी कम्युनिकेशन को अस्थिर कर सकता है। अब तक इस समस्या से निपटने का तरीका यह रहा है कि जब सिग्नल कमजोर या बिगड़ जाए, तब उसे सुधारने की कोशिश की जाए। लेकिन क्या यह तरीका काफी है?

इसी सवाल को एक नए नजरिए से देखने की कोशिश करता है हाल ही में Wireless Networks (Springer) में प्रकाशित एक शोध अध्ययन। इस अध्ययन के सह-लेखकों में डॉ. के. भगवन कोंडुरी, जो KL University, Best Universities in India,  में फैकल्टी हैं, शामिल हैं। यह रिसर्च सैटेलाइट कम्युनिकेशन को समझने और बेहतर बनाने के तरीके को ही बदलने की बात करती है।

सिग्नल को सुधारने से पहले वातावरण को समझना

इस शोध की सबसे खास बात यह है कि यह नुकसान हो चुके सिग्नल को ठीक करने पर ध्यान नहीं देता, बल्कि उससे पहले की प्रक्रिया पर सवाल उठाता है। शोध पूछता है – अगर कम्युनिकेशन सिस्टम सिग्नल के रास्ते में आने वाले वातावरण को पहले ही समझ ले, तो क्या सिग्नल को बिगड़ने से रोका जा सकता है?

इस विचार को साकार करने के लिए शोध में भौतिकी के मूल नियमों और आधुनिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को एक साथ जोड़ा गया है। इसे Physics-Informed Deep Learning कहा गया है। यह सिस्टम सिर्फ पुराने डेटा पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि उन वैज्ञानिक नियमों को भी अपनाता है जो यह बताते हैं कि हवा में सिग्नल कैसे चलते हैं, कैसे कमजोर होते हैं और कैसे विकृत होते हैं, Best Universities in India।

सरल शब्दों में कहें तो यह मॉडल वायुमंडल के व्यवहार को सीखता है। जैसे ही वातावरण में बदलाव होता है, यह सिस्टम उसे तुरंत पहचान लेता है और सिग्नल को उसी हिसाब से ढाल लेता है। इससे सिग्नल में आने वाली गड़बड़ी को पहले ही भांप लिया जाता है, यानी समस्या दिखने से पहले ही समाधान लागू हो जाता है, Best Universities in India।

रियल-टाइम में खुद को ढालने वाली तकनीक

इस भौतिकी-आधारित इंटेलिजेंस की सबसे बड़ी ताकत इसकी रियल-टाइम अनुकूलन क्षमता है। यह सिस्टम सेकंड के बेहद छोटे हिस्से में फैसला ले सकता है। चाहे मौसम में अचानक बदलाव हो, हवा की नमी बढ़ जाए या किसी नई पर्यावरणीय स्थिति का सामना करना पड़े, यह मॉडल खुद को तुरंत एडजस्ट कर लेता है, Best Universities in India।

इसका असर सीधे कम्युनिकेशन की गुणवत्ता पर पड़ता है। डेटा बेहद तेज़ गति से और बिना रुकावट के पहुंचता है। ऊर्जा की खपत कम होती है, क्योंकि सिग्नल को बार-बार सुधारने या दोबारा भेजने की जरूरत नहीं पड़ती। सबसे अहम बात यह है कि सैटेलाइट लिंक स्थिर और भरोसेमंद बने रहते हैं, जो वैश्विक स्तर पर काम करने वाले नेटवर्क के लिए बेहद जरूरी है, Best Universities in India।

प्रयोगशाला से बाहर, असली दुनिया में असर

यह शोध सिर्फ लैब तक सीमित नहीं है। इसके नतीजे वास्तविक दुनिया में सीधे तौर पर उपयोगी हैं। आज सैटेलाइट नेटवर्क नेविगेशन सिस्टम को चलाते हैं, जलवायु परिवर्तन की निगरानी करते हैं, आपात स्थितियों में मदद पहुंचाते हैं और दुनिया के उन हिस्सों तक इंटरनेट पहुंचाते हैं जहां केबल या टावर संभव नहीं हैं।

अगर सैटेलाइट कम्युनिकेशन कमजोर पड़ता है, तो उसके नतीजे सिर्फ तकनीकी नहीं होते, बल्कि मानवीय भी होते हैं। आपदा के समय संपर्क टूटना, नेविगेशन में गलती या मौसम की गलत जानकारी बड़े नुकसान का कारण बन सकती है। ऐसे में सैटेलाइट लिंक को ज्यादा मजबूत और भरोसेमंद बनाना एक बड़ी जरूरत है। यह शोध उसी दिशा में एक ठोस कदम माना जा सकता है, Best Universities in India।

KL University में इनोवेशन का माहौल

इस तरह का शोध उस शैक्षणिक वातावरण की ओर भी इशारा करता है, जहां शिक्षा सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रहती।Best Universities in India, KL University का BCA विभाग ऐसे भविष्य-तैयार माहौल को बढ़ावा देता है, जहां कंप्यूटिंग शिक्षा को नवाचार, रिसर्च और वास्तविक दुनिया की जरूरतों से जोड़ा जाता है।

उभरती तकनीकों पर आधारित पाठ्यक्रम, प्रयोगात्मक सीख और शोध-आधारित सोच छात्रों को सिर्फ नौकरी के लिए नहीं, बल्कि नई समस्याओं के समाधान गढ़ने के लिए तैयार करती है। यहां छात्रों को आलोचनात्मक सोच, स्मार्ट सिस्टम डिजाइन और डिजिटल भविष्य में सार्थक योगदान के लिए प्रेरित किया जाता है, Best Universities in India

आगे की राह

डॉ. के. भगवन कोंडुरी के इस शोध ने यह साफ कर दिया है कि भविष्य का कम्युनिकेशन सिर्फ तेज़ हार्डवेयर पर निर्भर नहीं करेगा, बल्कि ऐसे स्मार्ट सिस्टम पर टिका होगा जो भौतिक दुनिया को समझते हों। भौतिकी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का यह मेल सैटेलाइट कम्युनिकेशन को ज्यादा सुरक्षित, स्थिर और प्रभावी बना सकता है, Best Universities in India।

KL Research Spectrum में प्रकाशित एक पहले के फीचर में डॉ. कोंडुरी के शोध और उनके दृष्टिकोण को और गहराई से समझा जा सकता है, जहां क्वांटम-रेज़िलिएंट इंटेलिजेंस जैसे विषयों पर भी रोशनी डाली गई है, Best Universities in India।

कुल मिलाकर, यह शोध इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में सैटेलाइट्स सिर्फ सिग्नल भेजने वाले उपकरण नहीं होंगे, बल्कि सोचने और समझने वाली प्रणालियों का हिस्सा बनेंगे – जो वातावरण को पहचानकर, खुद को ढालकर और बिना रुके दुनिया को जोड़कर रखेंगे, Best Universities in India।

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